मिनरल वाटर: शुद्ध नहीं है बोतलबंद पानी miniral water
खाद्य सुरक्षा विभाग की छापेमारी से मचा हड़कंप, (मिनरल वाटर)बोतलबंद पानी की कई फैक्ट्रियों में गंदगी, अवैध संचालन और मानकों की भारी अनदेखी उजागर
लखनऊ। मिनरल वाटर और प्योर ड्रिंकिंग वॉटर जैसे आकर्षक दावों के पीछे छिपी सच्चाई एक बार फिर सवालों के घेरे में है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में की गई हालिया जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि हर (मिनरल वाटर) बोतलबंद पानी सुरक्षित और शुद्ध नहीं है। प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग की संयुक्त कार्रवाई में राजधानी की 29 पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर इकाइयों पर शिकंजा कसा गया, जिनमें से 24 स्थानों पर बेहद गंदगी और मानकों की खुली अनदेखी पाई गई।
छापेमारी में खुली पोल
पिछले कुछ दिनों से मिल रही शिकायतों के बाद खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) और नगर निगम की टीमों ने राजधानी के अलग-अलग इलाकों में संचालित बोतलबंद पानी की फैक्ट्रियों पर अचानक निरीक्षण किया। इस दौरान कई इकाइयों में फर्श पर कीचड़, खुले में पड़े कच्चे पानी के टैंक, जंग लगे फिल्टर और बिना ढक्कन की बोतलें मिलीं। कुछ जगहों पर तो पानी भरने की मशीनों के आसपास नालियों का पानी बहता पाया गया।
अधिकारियों के अनुसार, कई इकाइयां वर्षों से बिना नवीनीकरण के लाइसेंस पर काम कर रही थीं, जबकि कुछ के पास वैध दस्तावेज ही नहीं थे। जांच टीम ने मौके से पानी के सैंपल लेकर प्रयोगशाला जांच के लिए भेजे हैं।
मानकों की अनदेखी
ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (बीआईएस) के नियमों के अनुसार, पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर के लिए स्वच्छ परिसर, नियमित फिल्टर बदलना, आरओ और यूवी सिस्टम की सही कार्यप्रणाली तथा प्रशिक्षित स्टाफ अनिवार्य है। लेकिन जांच में सामने आया कि अधिकांश इकाइयों में न तो समय पर मशीनों की सर्विसिंग हो रही थी और न ही कर्मचारियों को स्वास्थ्य व स्वच्छता का प्रशिक्षण दिया गया था।
कुछ फैक्ट्रियों में बोतलों को धोने के लिए वही पानी इस्तेमाल किया जा रहा था, जिसे बाद में भरकर बाजार में बेचा जाता है। यह सीधे-सीधे उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य से खिलवाड़ है।
स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि दूषित बोतलबंद पानी से टायफाइड, डायरिया, हैजा और पेट से जुड़ी कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। खासकर बच्चे, बुजुर्ग और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोग इससे ज्यादा प्रभावित होते हैं। गर्मियों में जब पानी की खपत बढ़ जाती है, तब इस तरह की लापरवाही बड़े स्तर पर बीमारी फैलने का कारण बन सकती है।
एक स्वास्थ्य अधिकारी ने बताया, “लोग यह मान लेते हैं कि बोतलबंद पानी हमेशा सुरक्षित होता है, लेकिन हकीकत यह है कि अगर उत्पादन प्रक्रिया में गड़बड़ी हो, तो यह सामान्य नल के पानी से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है।”
मिनरल वाटर इकाइयों पर कार्रवाई और नोटिस
जांच के बाद प्रशासन ने 29 में से कई इकाइयों को तत्काल सुधार नोटिस जारी किए हैं। कुछ को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है, जबकि गंभीर उल्लंघन करने वालों के लाइसेंस रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि जब तक मानकों का पूरी तरह पालन नहीं किया जाएगा, तब तक इन इकाइयों को दोबारा संचालन की अनुमति नहीं मिलेगी।
इसके साथ ही, शहर में बिक रहे बोतलबंद पानी के ब्रांड्स की भी रैंडम सैंपलिंग की जाएगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बाजार में पहुंच रहा पानी सुरक्षित है या नहीं।
उपभोक्ताओं से अपील
प्रशासन ने आम लोगों से अपील की है कि वे बोतलबंद पानी खरीदते समय कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखें। बोतल पर बीआईएस मार्क, लाइसेंस नंबर, पैकेजिंग की तारीख और सील की स्थिति जरूर जांचें। अगर बोतल में पानी का रंग, गंध या स्वाद संदिग्ध लगे, तो उसका उपयोग न करें और संबंधित विभाग में शिकायत दर्ज कराएं।
मिनरल वाटर इकाइयों पर आगे और सख्ती के संकेत
अधिकारियों के मुताबिक, यह कार्रवाई सिर्फ शुरुआत है। आने वाले दिनों में लखनऊ के साथ-साथ प्रदेश के अन्य जिलों में भी इसी तरह की जांच की जाएगी। सरकार का उद्देश्य साफ है—लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना और मिलावटखोरों पर सख्त कार्रवाई करना।
बड़ा सवाल
यह मामला सिर्फ 29 इकाइयों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है। आखिर कैसे इतने लंबे समय तक ये इकाइयां बिना मानकों के काम करती रहीं? क्या निरीक्षण प्रक्रिया में ढिलाई थी या फिर जानबूझकर अनदेखी की गई? इन सवालों के जवाब ढूंढना जरूरी है, ताकि भविष्य में लोगों के स्वास्थ्य के साथ ऐसा खिलवाड़ न हो।
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फिलहाल, राजधानी में हुई इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि बोतलबंद पानी का लेबल भरोसे की गारंटी नहीं है। जागरूकता, नियमित जांच और सख्त कार्रवाई ही इस समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है।
