रिश्तों का कत्ल: दरिंदगी के बाद ज़हर पीने को मजबूर 16 साल की बेटी, पिता को आजीवन कारावास, फिर खुली सालों से दबी ‘हैवानियत’ की कहानी
शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश। रिश्तों की सबसे पवित्र डोर, ‘पिता-पुत्री’ के रिश्ते को तार-तार करने वाली एक वीभत्स कहानी सामने आई है। जिस पिता को बेटी का संरक्षक होना चाहिए था, वही शराबी दरिंदा बनकर सालों तक उसे मानसिक और शारीरिक यातना देता रहा। तीन बार की हैवानियत झेलने के बाद जब 16 वर्षीय नाबालिग का सब्र टूट गया, तो उसने मौत को गले लगाने की कोशिश की, जिसके बाद जाकर यह भयानक सच दुनिया के सामने आया।
“तीन बार उसने मुझ पर हैवानियत की… बदनामी के डर से घुटती रही, मगर तीसरी बार बर्दाश्त नहीं हुआ और मैंने जहर पी लिया।” – पीड़िता के शब्द
बचपन से शुरू हुई थी हैवानियत
घटना के सामने आने के बाद पता चला कि यह दरिंदगी एक बार की नहीं, बल्कि सालों पुरानी थी। पीड़िता ने अपनी माँ को बताया कि जब वह सिर्फ पाँच वर्ष की थी, तभी उसके जन्मदाता ने पहली बार उसके साथ दुष्कर्म किया था। अबोध होने के कारण वह चुप रही, और फिर बदनामी और पिता के डर से चुपचाप घुटती रही।
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पहली बार: जब बेटी सिर्फ 5 वर्ष की थी।
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दूसरी बार: 5 फरवरी 2022 को, जब परिवार के सदस्य रिश्तेदारी में गए थे।
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तीसरी बार: 6 मार्च 2022 की रात, जब माँ एक कार्यक्रम में गई थीं और बेटी घर में अकेली थी। इस बार पिता शराब के नशे में आया और मारपीट कर धमकाने के बाद दुष्कर्म किया।
मौत के मुहाने पर खुली ‘पिता’ की पोल
6 मार्च की तीसरी घटना के बाद नाबालिग पूरी तरह टूट गई। उसने पिता की इस शर्मनाक हरकत से शर्मिंदा होकर सिंघाड़े में डाली जाने वाली दवा (जहर) पीकर आत्महत्या की कोशिश की। जब माँ घर लौटीं और बेटी की तबियत बिगड़ी, तो पिता उसे अस्पताल ले जाने को तैयार नहीं था। उसे डर था कि कहीं उसका भेद न खुल जाए।
मगर, माँ ने हिम्मत कर बेटी को अस्पताल में भर्ती कराया। होश में आने पर, बेटी ने रो-रोकर माँ को पूरी कहानी बताई। वह दरिंदगी, वह डर, और बदनामी के डर से सालों तक चुप रहने का दर्द।
माँ ने ठाना न्याय और पिता को मिली उम्रकैद
बेटी के आँसू और पीड़ा सुनकर, माँ ने बेटी को इंसाफ दिलाने की ठान ली। महिला की तहरीर पर आरोपी पिता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई।
विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट, शिवकुमार तृतीय की अदालत में मुकदमा चला। गवाहों के बयान और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने दोषी पिता को ‘आजीवन कारावास’ (Life Imprisonment) की कठोरतम सजा सुनाई। साथ ही, उस पर ₹51,000/- का जुर्माना भी लगाया गया।
यह फैसला इस बात की पुष्टि करता है कि रिश्तों की आड़ में होने वाले ऐसे अपराधों के लिए समाज में कोई जगह नहीं है, और हर पीड़िता को न्याय मिलेगा, चाहे अपराधी कोई भी हो।
अबोध उम्र में शुरू हुई थी वहशत: 5 साल की मासूमियत पर पहला हमला
यह मामला केवल एक दुष्कर्म का नहीं, बल्कि एक बच्ची के बचपन, भरोसे और मानसिक स्वास्थ्य की सुनियोजित हत्या का है। अदालत में पेश किए गए तथ्यों से पता चला कि इस जघन्य अपराध की शुरुआत हाल ही में नहीं हुई थी। जब पीड़िता मात्र पाँच वर्ष की थी एक ऐसी उम्र जब बच्चे दुनिया को समझना शुरू करते हैं तभी उसके पिता ने अपनी हैवानियत का पहला शिकार उसे बनाया था।
पीड़िता ने अपनी माँ को बताया कि बचपन में वह अबोध थी, समझ नहीं पाई कि उसके साथ क्या हुआ। लेकिन धीरे-धीरे, पिता के धमकाने और घर की बदनामी के डर ने उसे सालों तक चुप रहने पर मजबूर कर दिया।
“वह चुप रही और अंदर ही अंदर घुटती रही।”—इस एक वाक्य में सालों का मानसिक संघर्ष छिपा है, जहाँ एक बच्ची अपने ही घर में, अपने ही पिता से डर कर जी रही थी।
शराबी पिता: परिवार के लिए अभिशाप
जाँच में यह भी सामने आया कि दोषी पिता कोई काम नहीं करता था और शराब का आदी था। वह आए दिन लोगों से झगड़ा करता रहता था। महिला के छह बच्चे हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं थी। इस शराबी और झगड़ालू प्रवृत्ति ने न केवल परिवार को आर्थिक कष्ट दिए, बल्कि घर के माहौल को भी विषाक्त कर दिया।
6 मार्च 2022 की रात, जब माँ रिश्तेदार के यहाँ गई थी, तब शराब के नशे में धुत पिता ने बेटी पर तीसरी बार हमला किया। यह हमला न केवल शारीरिक था, बल्कि उसने बेटी की आखिरी बची हुई आत्म-सम्मान और जीने की इच्छाशक्ति को भी तोड़ दिया।
बेटी का भेद, पिता का डर: अस्पताल ले जाने से किया मना
तीसरी बार की हैवानियत के बाद, जब पीड़िता ने आत्महत्या का प्रयास किया और उसकी तबियत बिगड़ने लगी, तो पिता का असली चेहरा सामने आया। माँ जब उसे अस्पताल ले जाने लगीं, तो पिता तैयार नहीं हुआ। यह उसका प्यार या चिंता नहीं थी, बल्कि डर था। उसे इस बात का डर था कि अगर बेटी बच गई और उसकी ज़ुबान खुली, तो उसका घिनौना राज सबके सामने आ जाएगा।
मगर, माँ की ममता भारी पड़ी। उसने पति की परवाह न करते हुए बेटी को अस्पताल में भर्ती कराया। वहाँ, ज़िंदगी और मौत से लड़ते हुए, बेटी ने अपनी माँ के सामने रो-रोकर अपनी सालों की पीड़ा बयां कर दी। इस क्षण माँ ने फैसला किया कि वह अपनी बेटी को इंसाफ दिलाकर रहेगी, चाहे इसके लिए उसे अपने पति को ही सजा दिलवानी पड़े।
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