अशरा-ए-ज़िलहिज्जा रहमत इबादत और कुर्बानी के सबसे मुबारक दिन
अशरा-ए-ज़िलहिज्जा साल के सबसे क़ीमती और बरकत वाले दिन
हज क़ुर्बानी और इबादत के इन दिनों में खुलते हैं रहमत के दरवाज़े

इस्लामी साल का आख़िरी महीना अशरा-ए-ज़िलहिज्जा अपने साथ रहमत, मग़फ़िरत और अल्लाह की ख़ास बरकतें लेकर आता है। ख़ास तौर पर इसके शुरुआती दस दिन, जिन्हें “अशरा-ए-ज़िलहिज्जा” कहा जाता है, इस्लाम में बेहद अज़मत और फ़ज़ीलत रखते हैं। इन दिनों में पूरी दुनिया के मुसलमान इबादत, तौबा, ज़िक्र और नेकियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। इन्हीं मुबारक दिनों में हज जैसी महान इबादत अदा की जाती है और सुन्नत-ए-इब्राहीमी की याद में क़ुर्बानी पेश की जाती है।
अख़बार के प्रतिनिधि ने इस सिलसिले में मशहूर इस्लामी विद्वान मुफ़्ती शुऐब आलम क़ासमी कुटेसरवी साहब से ख़ास बातचीत की। उन्होंने ज़िलहिज्जा के शुरुआती दस दिनों की अहमियत पर विस्तार से रोशनी डाली।
सवाल ज़िलहिज्जा के शुरुआती दस दिनों को इतनी अहमियत क्यों हासिल है?
मुफ़्ती शुऐब आलम क़ासमी साहब ने जवाब देते हुए कहा कि ज़िलहिज्जा इस्लामी कैलेंडर का बेहद मुबारक महीना है। अल्लाह तआला ने क़ुरआन और हदीस में इन दिनों की बड़ी फ़ज़ीलत बयान की है। रसूलुल्लाहﷺ ने फ़रमाया कि “अल्लाह के नज़दीक किसी भी दिन का नेक अमल इन दस दिनों के अमल से ज़्यादा महबूब नहीं।”
उन्होंने कहा कि इन दिनों की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि दुनिया भर से लाखों मुसलमान बैतुल्लाह पहुँचकर हज की अदायगी करते हैं। मैदान-ए-अरफ़ात में इंसानियत का ऐसा मंज़र दिखाई देता है जहाँ अमीर-ग़रीब, राजा-फ़क़ीर सब एक ही सफ़ में खड़े होकर अल्लाह के सामने अपने गुनाहों की माफ़ी माँगते हैं। यह मंज़र इंसान को अल्लाह की कुदरत और आख़िरत की याद दिलाता है।
हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की कुर्बानी की याद
मुफ़्ती साहब ने बताया कि अशरा-ए-ज़िलहिज्जा हमें हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की बेमिसाल कुर्बानी की याद भी दिलाता है। जब अल्लाह के हुक्म पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए, तो अल्लाह ने उनकी इस अज़ीम फ़रमाबरदारी को पूरी उम्मत के लिए मिसाल बना दिया। आज भी मुसलमान ईद-उल-अज़हा के मौके पर जानवर की कुर्बानी देकर उसी जज़्बे को ताज़ा करते हैं।
उन्होंने कहा कि कुर्बानी का असली मक़सद सिर्फ़ जानवर ज़बह करना नहीं, बल्कि अपनी ख़्वाहिशों, गुनाहों और बुराइयों को अल्लाह के हुक्म के आगे क़ुर्बान करना है।
इन दिनों में कौन-कौन सी इबादतें करनी चाहिए?
मुफ़्ती शुऐब आलम क़ासमी साहब ने मुसलमानों को नसीहत करते हुए कहा कि इन मुबारक दिनों में ज़्यादा से ज़्यादा इबादत का एहतिमाम करना चाहिए। उन्होंने बताया कि:
- पाँचों वक़्त की नमाज़ पाबंदी से अदा की जाए
- क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत की जाए
- तौबा और इस्तिग़फ़ार का एहतिमाम किया जाए
- रोज़ा रखने की कोशिश की जाए, ख़ास तौर पर 9 ज़िलहिज्जा यानी रोज़ा-ए-अरफ़ा
- तकबीर-ए-तशरीक़ और अल्लाह का ज़िक्र कसरत से किया जाए
- ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद की जाए
उन्होंने कहा कि जो लोग हज पर नहीं जा सकते, वे भी इन दिनों में नेक आमाल करके अल्लाह की रहमत हासिल कर सकते हैं।
नौजवानों के लिए ख़ास पैग़ाम
मुफ़्ती साहब ने नौजवानों को ख़ास तौर पर संबोधित करते हुए कहा कि आज का दौर फ़ितनों और गुनाहों से भरा हुआ है। ऐसे में अशरा-ए-ज़िलहिज्जा इंसान को अपनी ज़िंदगी सुधारने का बेहतरीन मौक़ा देता है। अगर नौजवान इन दिनों में अपने दिल को अल्लाह से जोड़ लें, नमाज़ और दीन की तरफ़ लौट आएँ, तो उनकी दुनिया और आख़िरत दोनों सँवर सकती हैं।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और दुनियावी मशगूलियतों में वक्त गंवाने के बजाय इन दिनों को इबादत, इल्म और अच्छे अख़लाक़ अपनाने में लगाना चाहिए।
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पूरी उम्मत के लिए दुआ
बातचीत के आख़िर में मुफ़्ती शुऐब आलम क़ासमी कुटेसरवी साहब ने दुआ की कि अल्लाह तआला पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमह को अशरा-ए-ज़िलहिज्जा की क़दर करने, नेकियों में बढ़ने और अपने गुनाहों से सच्ची तौबा करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। उन्होंने कहा कि यही दिन इंसान की ज़िंदगी बदल सकते हैं, बशर्ते वह सच्चे दिल से अल्लाह की तरफ़ रुजू करे।