न्यूक्लियर कानून india me New nuclear kanoon
सिविल न्यूक्लियर कानून में बड़े बदलाव की तैयारी, समझिए इसके दूरगामी असर
नई दिल्ली। भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को लेकर अब तक जो व्यवस्था पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में थी, उसमें ऐतिहासिक बदलाव की तैयारी हो चुकी है। केंद्र सरकार ने लोकसभा में सिविल न्यूक्लियर कानून से जुड़ा एक नया विधेयक पेश किया है, जिसके जरिए परमाणु ऊर्जा पर दशकों पुराना सरकारी एकाधिकार समाप्त करने का रास्ता खुल सकता है। अगर यह प्रस्ताव कानून का रूप ले लेता है, तो भविष्य में निजी कंपनियों के साथ-साथ व्यक्तिगत स्तर पर भी परमाणु ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाओं में भागीदारी संभव हो सकेगी।
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने इस विधेयक को संसद में पेश करते हुए कहा कि भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा एक अहम विकल्प बन चुकी है। सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2047 तक देश की परमाणु उत्पादन क्षमता को 100 गीगावॉट तक पहुंचाया जाए।
आखिर क्या है नया सिविल न्यूक्लियर विधेयक?
सरकार द्वारा लाया गया यह प्रस्ताव “सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI), 2025” के नाम से जाना जा रहा है। इसके लागू होने पर दो मौजूदा कानून—
- एटॉमिक एनर्जी एक्ट, 1962
- परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010
को समाप्त कर एक नई कानूनी व्यवस्था लाई जाएगी। फिलहाल देश में परमाणु सामग्री, रिएक्टर, रेडिएशन और सुरक्षा से जुड़े सभी नियम इन्हीं कानूनों के तहत संचालित होते हैं।
नए कानून में क्या बदलेगा?
SHANTI, 2025 विधेयक परमाणु ऊर्जा के उत्पादन, उपयोग और नियंत्रण के लिए एक नया रेगुलेटरी फ्रेमवर्क पेश करता है। इसमें रेडिएशन से जुड़े मानकों को स्पष्ट किया गया है और परमाणु ऊर्जा को भारत की स्वच्छ ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है।
सरकार का तर्क है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा सेंटर्स, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और बड़े पैमाने पर उद्योगों के कारण ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिसे पूरा करने में परमाणु ऊर्जा निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
परमाणु गतिविधियों पर नियंत्रण कैसे होगा?
विधेयक के अनुसार, किसी भी परमाणु परियोजना या रेडिएशन से संबंधित गतिविधि के लिए केंद्र सरकार और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) से अनिवार्य मंजूरी लेनी होगी।
इस कानून के तहत AERB को पहले से कहीं अधिक अधिकार दिए जाएंगे। अब यह बोर्ड—
- सुरक्षा मानकों की निगरानी
- रेडिएशन नियंत्रण
- परमाणु कचरे का प्रबंधन
- निरीक्षण और आपातकालीन प्रतिक्रिया
जैसे मामलों में निर्णायक भूमिका निभाएगा। किसी भी संभावित खतरे की स्थिति में सरकार रेडियोएक्टिव सामग्री या उपकरणों पर सीधे नियंत्रण भी ले सकेगी।

हादसे की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी?
परमाणु ऊर्जा जहां एक ओर लाभकारी है, वहीं थोड़ी सी लापरवाही बड़े हादसे का कारण बन सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए विधेयक में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी दुर्घटना की पहली जिम्मेदारी परमाणु संयंत्र के संचालक की होगी।
संचालक को जान-माल, पर्यावरण और संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई करनी होगी। हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में उसकी जिम्मेदारी सीमित हो सकती है, जैसे—
- अत्यंत विनाशकारी प्राकृतिक आपदाएं
- युद्ध, गृह संघर्ष या आतंकवादी घटनाएं
यदि नुकसान की राशि संचालक की निर्धारित सीमा से अधिक होती है, तो शेष मुआवजे का भार केंद्र सरकार उठाएगी।
न्यूक्लियर कानून में निजी संचालकों के लिए सख्त शर्तें
निजी कंपनियों और व्यक्तियों को परमाणु क्षेत्र में काम करने के लिए बीमा और वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। किसी दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे के निर्धारण के लिए एक विशेष परमाणु क्षति दावा आयोग गठित किया जाएगा।
वर्तमान में भारत का न्यूक्लियर इंश्योरेंस पूल लगभग 1500 करोड़ रुपये का कवरेज देता है। नए कानून में यह भी प्रावधान है कि लाइसेंस प्राप्त करने के लिए निजी कंपनियों को अनिवार्य रूप से अनुसंधान या नवाचार दिखाने की बाध्यता नहीं होगी, हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संस्थानों के लिए यह शर्त लागू रहेगी।
न्यूक्लियर कानून : सरकार क्यों खोल रही है परमाणु क्षेत्र?
अब तक भारत में परमाणु ऊर्जा पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रही है। न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) देश के सभी 23 परमाणु रिएक्टरों का संचालन करती है, जिनसे वर्तमान में लगभग 8.8 गीगावॉट बिजली पैदा होती है।
सरकार ने 2032 तक इस क्षमता को 22 गीगावॉट और 2047 तक 100 गीगावॉट तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना निजी निवेश के यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल है, इसी वजह से परमाणु क्षेत्र को खोलने का फैसला लिया गया है।
विदेशी कंपनियों को भी मिलेगा फायदा
नए विधेयक में विदेशी निवेशकों के लिए भी नियमों को सरल किया गया है। खास तौर पर परमाणु हादसे की स्थिति में सप्लायर कंपनियों की कानूनी जिम्मेदारी को हटाया गया है। यानी उपकरण या तकनीक देने वाली कंपनियां सीधे तौर पर हादसे की दोषी नहीं मानी जाएंगी।
यह बदलाव विदेशी कंपनियों की पुरानी मांग रही है। पहले के कानून में सप्लायर को भी कुछ मामलों में जिम्मेदार ठहराया जा सकता था, जिसका विरोध फ्रांस और अमेरिका की कई कंपनियों ने किया था। यही कारण रहा कि कई अंतरराष्ट्रीय परमाणु परियोजनाएं कागजों तक ही सीमित रह गईं।
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SHANTI, 2025 विधेयक भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत कर सकता है। हालांकि इससे ऊर्जा उत्पादन में तेजी आएगी, लेकिन सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल भी उतने ही अहम रहेंगे। अब देखना होगा कि संसद में इस विधेयक पर क्या सहमति बनती है और देश की परमाणु नीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।
