रमज़ान ( रोज़े ) का असली मक़सद तक़वा, आख़िरी अशरे में इबादत की अहमियत और शब-ए-क़द्र की तलाश का पैग़ाम
रमज़ान मुबारक का बरकतों भरा महीना अपनी तमाम रहमतों और नेमतों के साथ तेज़ी से गुज़र रहा है। अभी कुछ ही दिन पहले मुसलमानों ने इस मुबारक महीने का इस्तक़बाल खुशी और जोश के साथ किया था। मस्जिदें आबाद थीं, दिलों में इबादत का जज़्बा था और ज़बानों पर क़ुरआन की तिलावत की मिठास महसूस की जा रही थी। मगर देखते ही देखते रमज़ान के आख़िरी दिन आ पहुँचे हैं और यह मुबारक महीना हमें यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या हमने वाक़ई इस महीने का हक़ अदा किया है?
रमज़ान के आख़िरी दिन: मुहासिबा, तौबा और रहमत समेटने का सुनहरा मौक़ा
रमज़ान दरअसल सिर्फ़ भूख और प्यास का नाम नहीं है, बल्कि यह नफ़्स की तरबियत, दिल की इस्लाह और किरदार की तामीर का महीना है। क़ुरआन करीम में रोज़ों की फ़र्ज़ियत का मक़सद बयान करते हुए फ़रमाया गया है: “لَعَلَّكُمْ تَتَّقُوْنَ” यानी ताकि तुममें तक़वा पैदा हो। गोया रोज़े का असल मक़सद इंसान के अंदर ख़ुदा का डर और परहेज़गारी पैदा करना है। अगर रमज़ान गुज़र जाए और हमारी ज़िंदगी में तक़वा, ख़ुलूस और नेकी का जज़्बा पैदा न हो तो हमें संजीदगी के साथ अपने आमाल का मुहासिबा करना चाहिए।
शब-ए-क़द्र
रसूल-ए-अकरम ﷺ की सीरत रमज़ान की क़दरदानी का बेहतरीन नमूना पेश करती है। ख़ास तौर पर रमज़ान के आख़िरी अशरे में आप ﷺ इबादत में ग़ैर मामूली एहतिमाम फ़रमाते थे। हज़रत आयशा (रज़ि.) से रिवायत है कि जब आख़िरी अशरा शुरू होता तो नबी ﷺ रातों को ज़्यादा इबादत करते, अपने घरवालों को भी जगाते और इबादत में पूरी तरह मशग़ूल हो जाते। आप ﷺ एतिकाफ़ का एहतिमाम करते और शब-ए-क़द्र की तलाश में रातों को जागते। यह इस बात की दलील है कि रमज़ान के आख़िरी दिन दरअसल नेकी और रहमत को समेटने का बेहतरीन मौक़ा होते हैं।
रमज़ान का असली पैग़ाम
लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि हमारे समाज में रमज़ान का असली पैग़ाम अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाता है। शुरू के दिनों में इबादत का जोश होता है, मगर धीरे-धीरे सुस्ती और ग़फ़लत बढ़ने लगती है। मस्जिदों की रौनक कम होने लगती है और बाज़ारों की चहल-पहल बढ़ जाती है। हालाँकि रमज़ान का असली पैग़ाम दुनियावी मशग़ूलियत में बढ़ोतरी नहीं, बल्कि रूहानी इस्लाह और अल्लाह से रिश्ते को मज़बूत करना है।
रमज़ान के आख़िरी दिन दरअसल अल्लाह तआला की तरफ़ से एक अज़ीम मौक़ा होते हैं। इन्हीं दिनों में एक ऐसी मुबारक रात भी आती है जिसे शब-ए-क़द्र कहा जाता है। क़ुरआन करीम ने इस रात को “हज़ार महीनों से बेहतर” क़रार दिया है। इसका मतलब यह है कि जो शख़्स इस रात में ख़ुलूस के साथ इबादत करे, उसे एक लंबी ज़िंदगी की इबादत के बराबर सवाब मिल सकता है। इसलिए रमज़ान के आख़िरी अशरे में इबादत, दुआ और इस्तिग़फ़ार का ख़ास एहतिमाम करना चाहिए।
अल्लाह तआला की रहमत
यह भी हक़ीक़त है कि अगर रमज़ान के शुरुआती दिनों में हमसे कोई कोताही हो गई हो तो अब मायूस होने की ज़रूरत नहीं। अल्लाह तआला की रहमत बहुत वसीअ है और आख़िरी दिनों में सच्चे दिल से तौबा करने वाला भी उसकी मग़फ़िरत और रहमत का हक़दार बन सकता है। इसलिए इन बाक़ी दिनों में नमाज़ की पाबंदी, क़ुरआन की तिलावत, सदक़ा-ख़ैरात और ज़िक्र व दुआ का ख़ास एहतिमाम करना चाहिए। साथ ही दिलों को नफ़रत, हसद और कीना से पाक करना भी रमज़ान के पैग़ाम का अहम हिस्सा है।
नमाज़ की पाबंदी, अच्छे अख़लाक़
रमज़ान का ख़त्म होना दरअसल हमें एक अहम सवाल के सामने खड़ा कर देता है कि क्या हमने इस महीने से कुछ सीखा भी है या नहीं। अगर रमज़ान के बाद भी हमारी ज़िंदगी में नमाज़ की पाबंदी, अच्छे अख़लाक़ और गुनाहों से बचने का जज़्बा बाक़ी रहता है तो यही इस महीने की असली कामयाबी है। लेकिन अगर रमज़ान के जाते ही हम फिर ग़फ़लत की ज़िंदगी में लौट जाएँ तो हमें सोचना होगा कि हमने इस अज़ीम महीने की क़दर क्यों न की।
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इसलिए जब रमज़ान के ये आख़िरी दिन हमारे सामने हैं, तो हमें चाहिए कि इस क़ीमती मौक़े से भरपूर फ़ायदा उठाएँ, अपने गुनाहों से सच्ची तौबा करें और अल्लाह तआला से दुआ करें कि वह हमें रमज़ान की बरकतों को अपनी पूरी ज़िंदगी का हिस्सा बनाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। यक़ीनन कामयाब वही लोग हैं जो रमज़ान के पैग़ाम को सिर्फ़ एक महीने तक महदूद नहीं रखते बल्कि उसे अपनी पूरी ज़िंदगी का उसूल बना लेते हैं। अल्लाह ही तौफ़ीक़ देने वाला है।
मुफ़्ती शुऐब आलम क़ासमी कुटेसरवी
