ताऊ सिकंदर
ताऊ सिकंदर ने देखा जिंदगी का करीब एक सदी लंबा सफर
मुजफ्फरनगर। गांव सूजडु खालसा पट्टी निवासी लगभग 110 वर्ष की उम्र के ताऊ सिकंदर का इंतकाल होना गांव के लिए क्षति है, जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो सकती। उन्होंने जिंदगी का करीब एक सदी लंबा सफर देखा और इस दौरान बदलते समय, बदलते समाज और बदलती पीढ़ियों को अपनी आंखों के सामने गुजरते हुए देखा। ताऊ सिकंदर की सादगी और उनका व्यक्तित्व अपने आप में बीते दौर की एक जीवंत तस्वीर था। कुछ समय से वह बीमार चल रहे थे और आज जिंदगी की लंबी पारी पूरी कर हमेशा के लिए हमसे विदा हो गए।
ताऊ सिकंदर जैसे बुजुर्ग वास्तव में अनुभव का खजाना होते हैं। उनकी उम्र केवल वर्षों की गिनती नहीं होती, बल्कि उसमें जीवन के अनगिनत उतार-चढ़ाव, रिश्तों की समझ, समाज को देखने का नजरिया और समय से सीखे हुए अनेक सबक छिपे होते हैं। बरगद की बूढ़ी काया की तरह ऐसे बुजुर्ग अपनी अंतिम सांस तक अनुभव और सीख की छाया देते रहते हैं। उनकी मौजूदगी ही आने वाली पीढ़ियों के लिए एक भरोसा और मार्गदर्शन होती है। उम्र और अनुभव के मद्देनजर ताऊ सिकंदर को सम्मानित भी किया गया था, जो उनके लंबे जीवन और समाज में उनके महत्व का सम्मान था।
आज गांवों से एक-एक करके वह पीढ़ी विदा हो रही है, जिसने कठिन दौर देखा, अभावों में जीवन जिया और अपने अनुभवों से परिवारों तथा समाज को संभाला। पुराने और बुजुर्ग लोग केवल उम्रदराज व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे अपने साथ एक पूरा इतिहास लेकर चलते हैं। उनके पास बैठकर कुछ पल गुजारना, उनकी बातें सुनना और उनके अनुभवों को समझना आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी अनमोल विरासत से कम नहीं। उनका व्यवहार, उनकी सोच और जीवन से सीखे हुए छोटे-छोटे सबक कई बार ऐसी राह दिखा देते हैं, जो किताबों में भी नहीं मिलती।
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ताऊ सिकंदर अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनका जीवन और उनसे जुड़ी बातें लंबे समय तक गांव की स्मृतियों में जीवित रहेंगी। उनका जाना हमें यह भी याद दिलाता है कि जब तक हमारे घर-परिवार और गांवों में बुजुर्ग मौजूद हैं, हमें उनके पास बैठने, उनकी बातें सुनने और उनके अनुभवों को सहेजने के लिए समय निकालना चाहिए। क्योंकि वक्त गुजरने के बाद अक्सर एहसास होता है कि जिन बुजुर्गों को हम अपने आसपास सहज रूप से मौजूद मानते थे, वे दरअसल हमारी सबसे बड़ी विरासत थे। ताऊ सिकंदर की अल्लाह मगफिरत फरमाए।